इस लावारिस सी ग़ज़ल के बारे मे पहले भी लिख चुकी हूँ! लेकिन ऐसा लगा की शायद आज मुझे इसकी जितनी ज़रूरत है, पहले उतनी नही थी. आख़िर उम्मीद पे ही तो दुनिया कायम है!

Ummeed

मेरी खामोशियों में भी फ़साना ढूँढ लेती है,
बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूँढ लेती है,

हक़ीकत ज़िद किये बैठी है चकनाचूर करने को,
मगर हर आँख़ फिर सपना सुहाना ढूँढ लेती है,

ना चिड़िया की कमाई ना कारोबार है कोई,
वो केवल हौसले से आबुदाना ढूँढ लेती है,

समझ ना पाई दुनिया मस्लहत मंसूर की अब तक,
जो सूली पर भी हँसना मुस्कुराना ढूँढ लेती है,

उठाती है जो ख़तरा हर कदम पर डूब जाने का,
वही कोशिश समन्दर मे ख़ज़ाना ढूँढ लेती है,

जुनूं मन्ज़िल का राहों मे बचाता है भटकने से,
मेरी दीवानगी ख़ुद अपना ठिकाना ढूँढ लेती है!